“उस दृश्य की कल्पना करें जहां गोरे सिपाही लाठियां बरसाए जा रहे हैं, आज़ादी के दीवाने लहुलुहान हुए जा रहे हैं, एक गिरता है तो दुसरा उसकी जगह ले लेता है, लेकिन राष्ट्रस्मिता अमर तिरंगा को ज़मीन तक नहीं आने दिया जाता....”
यह थी भावनाएं हमें और हमारे मुल्क को आज़ादी की सौगात देने वाले दीवानों की.... और आज... आज तो ऐसे दृश्य आम हो गये हैं जहां राष्ट्र के सम्मान का प्रतीक तिरंगा बेहद आपत्तिजनक स्थिति में नज़र आता है. क्या तिरंगे के प्रति सम्मान की भावनाएं शहीदों के साथ ही विलुप्त हो गईं?
भारत में हर नागरिक को राष्ट्र ध्वज फहराने का अधिकार मिला हुआ है जो निश्चितरूप से गौरवपूर्ण और रोमांचकारी है. लेकिन दुःख तो तब होता है जब हम ही उस अधिकार का मान नहीं रख पाते और कर्तव्य विमुख हो अपने राष्ट्र ध्वज कहीं भी फेंक आने से गुरेज नहीं करते.
ऐसा ही एक शर्मनाक और आपत्तिजनक दृश्य हमें राजधानी रायपुर के एक
अति संपन्न इलाके में देखने को मिला जहांपर अशोकचक्र मय तिरंगे का बण्डल मुक्कड़ में डाल दिया गया था. "खबर छत्तीसी" द्वारा सुचना देने पर ज़ोन कमिश्नर और वार्ड पार्षद ने तत्परता के साथ कार्यवाही करते हुए बड़ी संख्या में पड़े तिरंगे को उठवाया

खबर छत्तीसी उन्हें साधुवाद देते हुए सरकार से अनुरोध करता है कि राष्ट्र ध्वज को व्यवसाय के रूप में स्थापित ना होने दें. निर्धारित आकार और कपडे का ही तिरंगा उपयोगार्थ उपलब्ध हो. किसी भी प्रकार से कागज़ और प्लास्टिक के तोरणों के रूप में तिरंगे की छपाई और इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबन्ध लागए जाए. ताकि राष्ट्र ध्वज का सम्मान अक्षुण्य रहे. साथ ही हम आमजन से विनम्र अपील करते हैं कि "मित्रों, तिरंगा हमारी आन बान और शान है और इसका स्थान “सबसे ऊंचा” ही अभीष्ट है. बेशक हम इसका इस्तेमाल गर्व से करें यह हमारा अधिकार है. लेकिन इसे इसे गर्व के साथ रखें भी, क्योंकि यही हमारा कर्तब्य है."
जयहिंद